Home Faculty Corner संस्कृत

संस्कृत

4 min read
0
15

न चोरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी ।
व्यये कृते वर्धते एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधन प्रधानम् ॥

अर्थःविद्यारूपी धन को न चोर चुरा सकता है न
राजा छीन सकता है न यह भाइयों में बाँटी जा
सकती है खर्च करने पर हमेशा बढ़ती है
विद्यारूपी धन इसलिए सबसे बड़ा धन है।

नरस्य आभरणं रूपम्
रूपस्य आभरणं गुणम्।
गुणस्य आभरणं ज्ञानम्
ज्ञानस्य आभरणं क्षमा।।

अर्थःमनुष्य का आभूषण उसका रूप है, रूप का
आभूषण गुण है, गुण का आभूषण ज्ञान है और
ज्ञान का आभूषण क्षमा है।

Load More Related Articles
Load More By admin
Load More In Faculty Corner

Check Also

Factors to Consider While Choosing Boarding School for Girls

The most significant and challenging phase of a child’s life is selecting the best school …